किसी भी घर में नए शिशु का आगमन असीम उल्लास का संचार करता है, किंतु यह आनंद अपने साथ एक अत्यंत संवेदनशील और भारी जिम्मेदारी भी लेकर आता है। आधुनिक समय में, माता-पिता की आयु चाहे जो भी हो, वे अक्सर एक ऐसे मनोवैज्ञानिक द्वंद्व और सामाजिक दबाव का शिकार होते हैं जहाँ पारंपरिक मान्यताओं और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के बीच का संघर्ष उन्हें दिग्भ्रमित कर देता है। डॉ. किरण फडतरे-घार्गे के अनुभवों के आधार पर यह स्पष्ट है कि शिशु के जन्म के शुरुआती एक-दो सप्ताह न केवल शिशु के लिए बल्कि मां के लिए भी एक सीखने की अवधि (learning curve) होते हैं। इस प्रारंभिक चरण में माता-पिता की मानसिक स्थिति और घर के बुजुर्गों के पारंपरिक अनुभवों के बीच अक्सर टकराव होता है, विशेषकर स्तनपान के विषय पर। यह समझना अनिवार्य है कि नवजात शिशु के पेट की क्षमता मात्र 5 से 7 मिलीलीटर होती है और प्रकृति शुरुआती दिनों में मां के शरीर में उतनी ही मात्रा में दूध का निर्माण करती है। ‘दूध कम पड़ने’ की धारणा अक्सर शारीरिक से अधिक मनोवैज्ञानिक होती है। स्तनपान पूरी तरह से ‘डिमांड और सप्लाई’ के जैविक चक्र पर आधारित है; जैसे-जैसे शिशु स्तनपान की प्रक्रिया को सीखता है और मांग बढ़ती है, मां के शरीर में हार्मोनल संतुलन के माध्यम से दूध की आपूर्ति स्वतः बढ़ जाती है। बाहरी हस्तक्षेप या समय से पहले फॉर्मूला मिल्क शुरू करने का दबाव मां के आत्मविश्वास को क्षीण करता है और इस प्राकृतिक पोषण चक्र को बाधित करता है, जबकि वैज्ञानिक रूप से फॉर्मूला मिल्क केवल उन विशेष चिकित्सीय परिस्थितियों में ही विकल्प होना चाहिए जहाँ कोई गंभीर बाधा हो।
इसी मनोवैज्ञानिक अस्थिरता के बीच, कई बार पारंपरिक उपचारों के नाम पर ऐसी प्रथाएं अपनाई जाती हैं जो शिशु के विकासशील अंगों के साथ एक गंभीर खिलवाड़ सिद्ध होती हैं। समाज में ‘गूँधे हुए आटे (कणिक) से रगड़कर बाल निकालना’, ‘आंखों में काजल लगाना’ और ‘कान में गर्म सरसों का तेल डालना’ जैसी परंपराएं न केवल अवैज्ञानिक हैं, बल्कि घातक भी हैं। शिशु की त्वचा अत्यंत अपरिपक्व और संवेदनशील होती है, जिस पर आटे का घर्षण संक्रमण और पस (pus) बनने का कारण बन सकता है। काजल का उपयोग ‘नेज़ोलक्रिमल डक्ट’ को अवरुद्ध कर सकता है, जिससे आँखों से निरंतर पानी आने और संक्रमण की समस्या उत्पन्न होती है। सबसे भयावह स्थिति तब होती है जब सर्दी-खांसी के उपचार के नाम पर कान में तेल डाला जाता है; यह तेल फेफड़ों तक पहुँचकर ‘केमिकल न्यूमोनाइटिस’ जैसी जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है, जिसमें शिशु को वेंटिलेटर की सहायता लेनी पड़ती है। इसी प्रकार, ‘घुटी’ देने की प्रथा जिसमें बादाम या जायफल का उपयोग होता है, स्वच्छता और सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत चिंताजनक है। जिस सिल-बट्टे (पत्थर) पर इन्हें बार-बार घिसा जाता है, उस पर अदृश्य फफूँद (fungus) जमा हो जाती है, जो शिशु के कच्चे पाचन तंत्र में पहुँचकर लूज मोशन और मल में रक्त आने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा करती है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि घुटी में उपयोग होने वाला जायफल एक शामक (sedative) की तरह कार्य करता है; जो मात्रा 60 किलो के वयस्क को सुला सकती है, वह 3 किलो के शिशु को केवल सुस्त और सुप्त (lethargic) बनाती है। माता-पिता को इस ‘चबी बेबी’ या गुबगुबीत शिशु के मोह से बाहर निकलना होगा, क्योंकि वजन बढ़ना अच्छे स्वास्थ्य का पर्याय नहीं है; एक दुबला लेकिन सक्रिय और सामान्य वजन वाला शिशु चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि में अधिक स्वस्थ है।
शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में पारंपरिक अंधविश्वासों से वैज्ञानिक समाधानों की ओर बढ़ता यह संक्रमण टीकाकरण के माध्यम से सबसे अधिक स्पष्ट होता है। यदि हम ऐतिहासिक आंकड़ों का निष्पक्ष विश्लेषण करें, तो वर्ष 1921 में शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 पर 126 थी, जो चिकित्सा प्रगति के कारण वर्ष 2023 में घटकर मात्र 24 रह गई है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर, जो कभी 230 थी, अब मात्र 28 पर आ गई है। यह क्रांतिकारी परिवर्तन प्रभावी टीकाकरण का ही परिणाम है, जिसने भारत से पोलियो जैसे रोगों को समूल नष्ट कर दिया और रोटावायरस जैसी वैक्सीन से डायरिया जनित मृत्यु दर को नियंत्रित किया। टीकाकरण के संदर्भ में अक्सर ‘पीडियाट्रिक स्पेशलिस्ट’ के स्तर पर यह स्पष्ट किया जाता है कि राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम (National Immunization Schedule) एक अनिवार्य आधार है, किंतु निजी स्तर पर उपलब्ध ‘IAP शेड्यूल’ सुरक्षा का अतिरिक्त घेरा प्रदान करता है। इसमें इन्फ्लूएंजा, हेपेटाइटिस-ए, और टायफॉइड कॉन्जुगेट जैसी महत्वपूर्ण वैक्सीन शामिल हैं। साथ ही, ‘HPV’ (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) वैक्सीन जैसी आधुनिक प्रगति भविष्य में कैंसर जैसी घातक बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करती है। ‘पेनलेस’ बनाम ‘पेनफुल’ वैक्सीन का विवाद केवल काली खांसी (Pertussis) के घटक में तकनीक के अंतर तक सीमित है; दोनों ही समान रूप से प्रभावी हैं। अतः, विलासिता के खर्चों के बजाय टीकाकरण को प्राथमिकता देना ही आधुनिक परवरिश का सही दृष्टिकोण है।
स्वास्थ्य सुरक्षा के इस आयाम के साथ-साथ, आधुनिक जीवनशैली ने बच्चों के समक्ष मोटापे (Obesity) और डिजिटल व्यसन का एक नया चयापचय (metabolic) संकट खड़ा कर दिया है। एक गंभीर चेतावनी के अनुसार, वर्ष 2050 तक भारत में लगभग 45 करोड़ लोग मोटापे का शिकार हो सकते हैं, जिनमें एक बड़ा हिस्सा आज की नई पीढ़ी का होगा। भोजन में चीनी और गुड़ का अत्यधिक उपयोग ‘एम्प्टी कैलोरी’ के रूप में केवल वजन बढ़ाता है, पोषण नहीं। इसके अतिरिक्त, ‘डिस्ट्रैक्टेड ईटिंग’ यानी मोबाइल देखते हुए खाना खिलाने की प्रवृत्ति शिशु के शारीरिक तंत्र को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है। जब बच्चा स्क्रीन में लीन होकर खाता है, तो उसके शरीर में पाचन एंजाइमों (Digestive Enzymes) का उचित स्राव बाधित हो जाता है और वह ‘माइंडफुल ईटिंग’ की नैसर्गिक क्षमता खो देता है। उसे स्वाद, रंग और अपनी भूख की तृप्ति का आभास ही नहीं होता, जो भविष्य में ईटिंग डिसऑर्डर और मेटाबोलिक रोगों की नींव रखता है। विशेषज्ञों की स्पष्ट अनुशंसा है कि शून्य से दो वर्ष तक के बच्चों के लिए ‘जीरो स्क्रीन टाइम’ होना चाहिए, क्योंकि यह न केवल उनके मानसिक विकास को अवरुद्ध करता है बल्कि उनके सामाजिक कौशलों को भी शिथिल कर देता है।
परवरिश का वास्तविक दर्शन केवल भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाना नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और भावनात्मक रूप से सुरक्षित परिवेश निर्मित करना है। माता-पिता को स्वयं को एक ‘रोल मॉडल’ के रूप में स्थापित करना होगा; यदि वे स्वयं निरंतर डिजिटल उपकरणों में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चों से संयम की अपेक्षा करना तर्कसंगत नहीं है। बच्चों की रचनात्मकता के विकास के लिए उन्हें ‘ओवर-शेड्यूलिंग’ और निरंतर कक्षाओं के बोझ से मुक्त कर ‘फ्री प्ले’ यानी स्वतंत्र खेल के लिए पर्याप्त समय देना अनिवार्य है। यही वह समय है जब उनका मस्तिष्क नए न्यूरल कनेक्शन बनाता है। इसके साथ ही, शारीरिक और मानसिक सुदृढ़ता के लिए 9 से 12 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद प्राथमिक आवश्यकता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को ‘ओवर-प्रोटेक्टिव’ बनाने या उनके हर क्षण को ‘ओवर-प्लान’ करने के बजाय उन्हें अपनी भावनाओं को समझने और चुनौतियों का सामना करने का सुरक्षित अवसर प्रदान करें। अंततः, बच्चों का सही शारीरिक पोषण, वैज्ञानिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण और संतुलित मानसिक विकास ही वह आधार है जिस पर एक सशक्त राष्ट्र की भावी पीढ़ी का निर्माण संभव है।
