बांग्लादेश के वस्त्र उद्योग का पतन और भारत का उदय

बांग्लादेश के वस्त्र उद्योग

बांग्लादेश का वस्त्र उद्योग, जो दशकों से उसकी अर्थव्यवस्था का मेरुदंड और विदेशी मुद्रा अर्जन का मुख्य स्रोत रहा है, आज ‘रणनीतिक पंगुता’ के एक ऐसे दौर में है जहां उसकी नींव हिल चुकी है। वर्तमान औद्योगिक अशांति ने इस क्षेत्र को लगभग 400 मिलियन डॉलर का तत्काल सदमा दिया है, जिससे 50 से अधिक प्रमुख टेक्सटाइल मिलें बंद होने की कगार पर हैं। यह केवल एक आर्थिक गिरावट नहीं, बल्कि एक भयावह सामाजिक विखंडन का संकेत है, क्योंकि यहाँ 10 लाख प्रत्यक्ष नौकरियों पर संकट मंडरा रहा है। व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह संकट 1.5 करोड़ लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा है, जिनमें अधिकांश महिला श्रमिक हैं। बांग्लादेश की कुल विदेशी मुद्रा भंडार में 84 प्रतिशत का योगदान देने वाला और जीडीपी में 11 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाला यह सेक्टर अब अपनी ‘आर्थिक संप्रभुता’ खो रहा है। यह अस्थिरता उस समय चरम पर है जब भारत ने अपनी व्यापारिक और रणनीतिक घेराबंदी के माध्यम से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का विस्थापन (displacement of supply chains) अपने पक्ष में करना शुरू कर दिया है।

भारत द्वारा यूरोपीय संघ के साथ हाल ही में की गई व्यापार संधि इस दिशा में एक निर्णायक प्रहार है। अब तक बांग्लादेश को मिलने वाली ‘ड्यूटी-फ्री’ पहुंच ही उसे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बढ़त दिलाती थी, लेकिन भारत ने यूरोपीय संघ के 263 अरब डॉलर के विशाल बाजार में 0 प्रतिशत टैरिफ पर प्रवेश सुनिश्चित करके इस समीकरण को जड़ से बदल दिया है। बांग्लादेश का 80 प्रतिशत निर्यात राजस्व अब सीधे तौर पर भारत की इस नई प्रतिस्पर्धी शक्ति की जद में है। स्थिति की गंभीरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां अमेरिका जैसे प्रमुख बाजार में बांग्लादेश को 35 प्रतिशत के भारी दंडात्मक टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है, वहीं भारत ने अपनी रणनीतिक वार्ताओं के माध्यम से 25 प्रतिशत के टैरिफ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत की है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के विश्लेषण के अनुरूप, अब वह समय समाप्त हो गया है जब बांग्लादेश केवल भारत द्वारा प्रदान किए गए कच्चे माल और अपनी शुल्क-मुक्त पहुंच के कारण भारतीय वस्त्र उद्योग को पीछे छोड़ पा रहा था। भारत ने अब इस ‘ड्यूटी-फ्री’ लाभ को वैश्विक संधियों के माध्यम से निष्प्रभावी कर दिया है।

रणनीतिक मोर्चे पर भारत ने ‘परोक्ष इनकार’ की नीति अपनाते हुए बांग्लादेश की लॉजिस्टिक व्यवस्था को पंगु बना दिया है। मोहम्मद यूनुस प्रशासन के चीन और पाकिस्तान की ओर झुकाव तथा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के प्रति दिखाई गई संकीर्ण दृष्टि के जवाब में भारत ने अपनी सीमाओं और बंदरगाहों के नियमों को कड़ा कर दिया है। भारत ने बांग्लादेशी निर्यात के लिए लैंड पोर्ट्स के दरवाजे सीमित कर दिए हैं और उनके माल को मुंबई के न्हावा शेवा बंदरगाह के माध्यम से ट्रांसशिपमेंट के लिए बाध्य किया है। इस लंबी और खर्चीली प्रक्रिया ने बांग्लादेशी उत्पादों को नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी बाजारों के लिए पूरी तरह अव्यावहारिक बना दिया है। इसके साथ ही, ऊर्जा के मोर्चे पर भी गहरा संकट खड़ा हुआ है। अडानी पावर झारखंड लिमिटेड के बकाया भुगतान विवाद के चलते बिजली आपूर्ति में की गई 60 प्रतिशत की कटौती ने बांग्लादेशी कारखानों को क्रियात्मक रूप से मृतप्राय कर दिया है। बिजली की कमी और लॉजिस्टिक अवरोधों ने वैश्विक फैशन दिग्गजों का विश्वास बांग्लादेश से पूरी तरह हटा दिया है।

वैश्विक ब्रांड्स जैसे ज़ारा, एचएंडएम, टॉमी हिलफिगर और केल्विन क्लेन के लिए बांग्लादेश अब एक जोखिम भरा विकल्प बन चुका है। विडंबना यह है कि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक होने के बावजूद बांग्लादेश कच्चे माल, विशेषकर धागे और कपास के लिए भारत पर निर्भर है। वर्तमान में बांग्लादेश के पास लगभग 12,000 करोड़ रुपये का भारतीय धागे का स्टॉक बिना बिका पड़ा है, क्योंकि घरेलू उत्पादन की तुलना में सस्ते भारतीय आयात ने स्थानीय मिलों को हड़ताल पर जाने के लिए मजबूर कर दिया है। भारत अब केवल कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि फिनिश्ड गुड्स के क्षेत्र में एक शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरा है। वैश्विक फैशन ब्रांड अब स्थिरता और समयबद्धता की तलाश में भारत का रुख कर रहे हैं, क्योंकि बांग्लादेश का राजनीतिक और आर्थिक वातावरण अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ‘लीड टाइम’ सुनिश्चित करने में अक्षम है।

शेख हसीना के युग की आर्थिक स्थिरता के विपरीत मोहम्मद यूनुस का वर्तमान प्रशासन ‘आर्थिक निरक्षरता’ का प्रदर्शन कर रहा है। पाकिस्तान द्वारा सुझाया गया मध्य एशियाई व्यापार मार्ग एक कोरी कल्पना मात्र है, क्योंकि स्वयं पाकिस्तान का व्यापार घाटा हाल के महीनों में 44 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। चीन भी बांग्लादेश के लिए कोई समाधान नहीं हो सकता, क्योंकि वह वस्त्र उद्योग में एक प्रतिद्वंद्वी है, न कि कोई बाजार। भारत से दूरी बनाने की इस आत्मघाती नीति ने बांग्लादेश को उस ‘मोस्ट फेवर्ड’ लॉजिस्टिक दर्जे से वंचित कर दिया है जो उसकी प्रगति का आधार था। दूसरी ओर, भारत अपने विजन 2030 के तहत 100 अरब डॉलर के कपड़ा निर्यात के लक्ष्य की ओर दृढ़ता से बढ़ रहा है। गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्य उस उत्पादन क्षमता को आत्मसात करने के लिए तैयार हैं जो बांग्लादेश से पलायन कर रही है। भारत ने प्राचीन ‘अर्थशास्त्र’ के सिद्धांतों का आधुनिक उपयोग करते हुए बिना किसी प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष के एक क्षेत्रीय आर्थिक वर्चस्व स्थापित कर लिया है। अंततः, यूरोपीय संघ के विशाल बाजार और अपनी मजबूत बुनियादी ढांचा नीतियों के साथ भारत वैश्विक वस्त्र आपूर्ति श्रृंखला के नए केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका है, जो इस पूरे क्षेत्र की भू-राजनीतिक और आर्थिक नियति को पुनर्परिभाषित कर रहा है।

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