भारत आज एक ऐसे सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है, जो आधुनिक चिकित्सा की सफलता से ही जन्मा है। एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी रोगाणुरोधी प्रतिरोध अब केवल वैज्ञानिक शब्दावली या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों तक सीमित विषय नहीं रहा, बल्कि यह राष्ट्रीय नीति और जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। जब जीवन रक्षक दवाएं ही अपना असर खोने लगें, तो यह स्थिति किसी एक व्यक्ति या अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरे समाज और शासन व्यवस्था की सामूहिक चिंता का विषय बन जाती है।
एंटीबायोटिक दवाओं ने बीसवीं सदी में चिकित्सा विज्ञान में क्रांतिकारी बदलाव किया। बैक्टीरिया से होने वाली अनेक घातक बीमारियां, जो पहले जानलेवा थीं, इन दवाओं के कारण नियंत्रित हो सकीं। लेकिन इसी सफलता ने दवाओं के प्रति एक लापरवाह दृष्टिकोण भी विकसित किया। भारत में एंटीबायोटिक को सामान्य दवा के रूप में देखा जाने लगा, जिसे सर्दी-जुकाम, बुखार या किसी भी संक्रमण में बिना जांच-पड़ताल के लिया जा सकता है। यहीं से समस्या की जड़ शुरू होती है।
विज्ञान स्पष्ट है कि एंटीबायोटिक केवल बैक्टीरियल संक्रमण पर प्रभावी होती हैं, न कि वायरस जनित रोगों पर। इसके बावजूद आम जीवन में वायरल बुखार, फ्लू या खांसी-जुकाम जैसी स्थितियों में इन दवाओं का प्रयोग आम हो गया है। जब एंटीबायोटिक अनावश्यक रूप से ली जाती हैं, तो वे शरीर में मौजूद कमजोर बैक्टीरिया को तो नष्ट कर देती हैं, लेकिन कुछ मजबूत बैक्टीरिया जीवित रह जाते हैं। ये बैक्टीरिया अपने भीतर आनुवंशिक बदलाव विकसित कर लेते हैं, जिससे वे भविष्य में उन्हीं दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बन जाते हैं। धीरे-धीरे यही प्रक्रिया ‘सुपरबग’ के निर्माण की ओर ले जाती है, जिन पर सामान्य दवाओं का कोई असर नहीं होता।
भारत में यह संकट कई कारणों से और अधिक गंभीर हो जाता है। सबसे बड़ा कारण है बिना डॉक्टर की पर्ची के दवाओं की उपलब्धता। ओवर-द-काउंटर दवाओं के रूप में एंटीबायोटिक आसानी से मिल जाना नियमों के बावजूद एक आम वास्तविकता है। दवा विक्रेता अक्सर लक्षण सुनकर दवा दे देते हैं और मरीज भी त्वरित राहत की उम्मीद में जांच कराने से बचते हैं। इस प्रवृत्ति ने वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति को कमजोर किया है और लक्षण-आधारित इलाज को बढ़ावा दिया है।
दूसरी समस्या है जांच के प्रति सामाजिक मानसिकता। आज भी बड़ी संख्या में लोग प्रयोगशाला जांच को अनावश्यक खर्च मानते हैं। ऐसे में डॉक्टर द्वारा जांच की सलाह को अनुभवहीनता समझ लिया जाता है, जबकि वास्तव में सही निदान के बिना दी गई दवाएं दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकती हैं। जब बिना पुष्टि के एंटीबायोटिक दी जाती हैं, तो वे बीमारी को ठीक करने के बजाय प्रतिरोधक बैक्टीरिया को जन्म देती हैं।
अस्पतालों की स्थिति भी इस समस्या से अछूती नहीं है। कई बार एहतियात के तौर पर मरीजों को एंटीबायोटिक दे दी जाती हैं, भले ही संक्रमण की पुष्टि न हुई हो। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि अस्पतालों में पहले से ही कमजोर प्रतिरक्षा वाले मरीज मौजूद होते हैं। ऐसे वातावरण में प्रतिरोधी बैक्टीरिया तेजी से फैलते हैं और इलाज को जटिल बना देते हैं।
मानव चिकित्सा के अलावा पशुपालन और कृषि क्षेत्र में एंटीबायोटिक का व्यापक उपयोग भी चिंता का विषय है। पशुओं को तेजी से बढ़ाने या संक्रमण से बचाने के लिए दी जाने वाली दवाएं खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर तक पहुंच जाती हैं। इससे न केवल प्रतिरोध की समस्या बढ़ती है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी प्रभावित होता है। जैव-संचयन के माध्यम से ये दवाएं प्रकृति के अन्य जीवों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।
इस संकट के परिणाम दूरगामी हैं। जब दवाएं असर करना बंद कर देती हैं, तो सामान्य संक्रमण भी जानलेवा बन सकते हैं। इलाज की अवधि लंबी हो जाती है, अस्पताल में भर्ती रहने का समय बढ़ता है और स्वास्थ्य सेवाओं की लागत में भारी वृद्धि होती है। यह स्थिति गरीब और मध्यम वर्ग के लिए विशेष रूप से घातक है, जहां पहले से ही स्वास्थ्य संसाधन सीमित हैं। इसके अतिरिक्त, शल्य चिकित्सा, कैंसर उपचार और गहन चिकित्सा जैसी आधुनिक प्रक्रियाएं भी एंटीबायोटिक पर निर्भर हैं। यदि ये दवाएं निष्प्रभावी हो जाएं, तो आधुनिक चिकित्सा की पूरी संरचना ही संकट में पड़ सकती है।
नीतिगत स्तर पर समस्या को समझने और नियंत्रित करने के प्रयास शुरू हुए हैं। दवाओं की बिक्री पर नियंत्रण, जागरूकता अभियानों और उपचार दिशानिर्देशों के माध्यम से सरकारें स्थिति को संभालने का प्रयास कर रही हैं। कुछ राज्यों में ओवर-द-काउंटर एंटीबायोटिक बिक्री पर सख्ती के सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले हैं। यह संकेत देता है कि सही नीति और कड़े क्रियान्वयन से बदलाव संभव है।
फिर भी, केवल कानून और नियम पर्याप्त नहीं हैं। इस संकट से निपटने के लिए सामाजिक व्यवहार में बदलाव अनिवार्य है। मरीजों को यह समझना होगा कि हर बुखार में दवा जरूरी नहीं होती और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए इलाज का पूरा कोर्स करना क्यों आवश्यक है। अधूरा कोर्स बैक्टीरिया को और अधिक मजबूत बनाता है। डॉक्टरों और फार्मासिस्टों की भी जिम्मेदारी है कि वे दबाव में आकर अनावश्यक दवाएं न दें और वैज्ञानिक मानकों का पालन करें।
साथ ही, निगरानी और अनुसंधान को मजबूत करना समय की मांग है। देशभर में प्रतिरोध के पैटर्न पर लगातार नजर रखना आवश्यक है, ताकि उपचार नीतियां वास्तविक आंकड़ों पर आधारित हों। प्रयोगशालाओं, अस्पतालों और नीति-निर्माताओं के बीच समन्वय से ही एक प्रभावी राष्ट्रीय रणनीति विकसित की जा सकती है। नई दवाओं के विकास और वैकल्पिक उपचारों पर भी निवेश बढ़ाना होगा, क्योंकि वैश्विक स्तर पर नई एंटीबायोटिक का विकास धीमा पड़ा है।
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यह याद दिलाता है कि व्यक्तिगत निर्णय भी सामूहिक भविष्य को प्रभावित करते हैं। आज ली गई एक अनावश्यक दवा कल किसी और के जीवन को खतरे में डाल सकती है। इसलिए यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का भी प्रश्न है। यदि भारत को अपनी जनसंख्या और स्वास्थ्य प्रणाली को सुरक्षित रखना है, तो एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण उपयोग को जनआंदोलन का रूप देना होगा। समय रहते ठोस कदम उठाए गए, तो इस संकट को नियंत्रित किया जा सकता है; अन्यथा, वह दौर लौट सकता है जब साधारण संक्रमण भी मृत्यु का कारण बनते थे।
एंटीबायोटिक संकट
