इसरो के सामने गहराता संकट

इसरो के सामने गहराता संकट

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इस समय अपने इतिहास के एक कठिन और निर्णायक दौर से गुजर रहा है। हाल के वर्षों में चंद्रयान और आदित्य-एल1 जैसी सफलताओं ने भारत की वैज्ञानिक क्षमता को वैश्विक मंच पर स्थापित किया, परंतु 2025 और 2026 की शुरुआत में सामने आई असफलताओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उपलब्धियों के पीछे छिपी संरचनात्मक कमजोरियों पर अब गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक है। विशेष रूप से पीएसएलवी जैसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यान की हालिया विफलताएँ केवल तकनीकी घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि नीति, संसाधन और प्राथमिकताओं से जुड़ी व्यापक समस्या का संकेत देती हैं।

पीएसएलवी को लंबे समय तक इसरो का सबसे विश्वसनीय प्रक्षेपण यान माना गया है। लगभग 96 प्रतिशत की ऐतिहासिक सफलता दर के कारण यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की रीढ़ रहा। किंतु बीते बारह महीनों में लगातार असफलताओं ने इस भरोसे को झकझोर दिया है। मई 2025 और जनवरी 2026 की विफलताओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मौजूदा ढाँचा बढ़ती जटिलताओं और अपेक्षाओं का सामना करने में सक्षम है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का क्षेत्र अब केवल प्रक्षेपण तक सीमित नहीं है; यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत सामग्री विज्ञान और गहन अनुसंधान पर आधारित हो चुका है। ऐसे में सीमित संसाधनों के साथ लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है।

इसरो की सफलता का एक बड़ा आधार उसका कम बजट में अधिक करने का मॉडल रहा है। यह मॉडल प्रशंसनीय अवश्य है, पर इसकी भी एक सीमा है। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि भारत का अंतरिक्ष बजट प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों की तुलना में अत्यंत कम है। सीमित वित्तपोषण के बावजूद बड़े लक्ष्यों को साधने की प्रवृत्ति न केवल वैज्ञानिकों पर अनावश्यक दबाव डालती है, बल्कि दीर्घकालीन नवाचार को भी प्रभावित करती है। अनुसंधान और विकास में पर्याप्त निवेश के बिना अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता संभव नहीं है। यह समस्या केवल इसरो तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश के अनुसंधान तंत्र को प्रभावित कर रही है।

भारत का आरएंडडी पर व्यय वैश्विक मानकों की तुलना में काफी कम है। विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अपनी जीडीपी का बड़ा हिस्सा अनुसंधान में लगाकर भविष्य की तकनीकों में बढ़त बना रही हैं। इसके विपरीत भारत में अनुसंधान को अब भी खर्च के रूप में देखा जाता है, निवेश के रूप में नहीं। इसका सीधा प्रभाव अंतरिक्ष, रक्षा, स्वास्थ्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर पड़ता है। यदि इस प्रवृत्ति में परिवर्तन नहीं हुआ, तो भारत की तकनीकी प्रतिस्पर्धा क्षमता धीरे-धीरे कमजोर होती जाएगी।

इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी भी इसरो के सामने एक गंभीर चुनौती है। भारत के पास फिलहाल केवल एक ही प्रमुख ऑर्बिटल लॉन्च साइट है। मौसम संबंधी बाधाएँ या किसी एक मिशन की असफलता पूरे प्रक्षेपण कार्यक्रम को प्रभावित कर सकती है। अन्य अंतरिक्ष शक्तियों ने इस जोखिम को समझते हुए कई प्रक्षेपण स्थलों का विकास किया है। भारत में दूसरा लॉन्चपैड निर्माणाधीन है, परंतु इसकी गति और प्राथमिकता पर सवाल उठते रहे हैं। अंतरिक्ष कार्यक्रम जैसे संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में ऐसी निर्भरता दीर्घकाल में जोखिमपूर्ण सिद्ध हो सकती है।

यह स्थिति स्पष्ट संकेत देती है कि अब केवल वैज्ञानिक कौशल या सीमित संसाधनों के सहारे आगे बढ़ना पर्याप्त नहीं है। नीति स्तर पर निर्णायक हस्तक्षेप, दीर्घकालीन वित्तीय प्रतिबद्धता और अनुसंधान को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने की आवश्यकता है। इसरो के वैज्ञानिकों की क्षमता और समर्पण पर कोई संदेह नहीं है, परंतु उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए समान रूप से मजबूत समर्थन तंत्र चाहिए। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और भविष्य की पीढ़ियों के अवसरों से जुड़ा प्रश्न है। इस दिशा में समय रहते ठोस कदम उठाना ही भारत के अंतरिक्ष सपनों को स्थायी आधार दे सकता है।

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