भारत में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर होने वाली नीतिगत चर्चाएँ प्रायः संस्थागत प्रसव, टीकाकरण कार्यक्रमों और स्वास्थ्य ढाँचे तक सीमित रह जाती हैं। परन्तु नवजात शिशु के जीवन की सबसे पहली और सबसे प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था प्रसव के कुछ ही घंटों में प्रारम्भ हो जाती है। यह सुरक्षा किसी प्रयोगशाला या दवा से नहीं, बल्कि माँ के शरीर द्वारा स्वाभाविक रूप से उत्पन्न कोलोस्ट्रम से मिलती है। इसके बावजूद, कोलोस्ट्रम को लेकर सामाजिक भ्रान्तियाँ, परम्परागत धारणाएँ और व्यवहारिक लापरवाही आज भी नवजात स्वास्थ्य के मार्ग में बड़ी बाधा बनी हुई हैं।
कोलोस्ट्रम वह गाढ़ा, पीले रंग का पहला दूध है जो प्रसव के तुरंत बाद दो से तीन दिनों तक माँ के शरीर से निकलता है। इसकी मात्रा कम होती है, लेकिन इसकी गुणवत्ता असाधारण होती है। यह दूध विशेष रूप से नवजात शिशु की नाज़ुक प्रतिरक्षा और पाचन प्रणाली को ध्यान में रखकर प्रकृति द्वारा तैयार किया गया है। नवजात का पेट प्रारम्भ में बहुत छोटा होता है और कोलोस्ट्रम की सीमित मात्रा उसी के अनुरूप होती है। इसे अपर्याप्त मानना जैविक समझ की कमी को दर्शाता है।
स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार कोलोस्ट्रम में एंटीबॉडीज़ की अत्यधिक मात्रा होती है, विशेषकर वे जो शिशु को संक्रमणों से बचाने में सहायक होती हैं। इसे अक्सर शिशु का पहला प्राकृतिक टीका कहा जाता है, क्योंकि यह बिना किसी इंजेक्शन या दवा के शिशु को प्रारम्भिक प्रतिरक्षा प्रदान करता है। भारत जैसे देश में, जहाँ नवजात संक्रमण अब भी शिशु मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल हैं, कोलोस्ट्रम की भूमिका और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
इसके बावजूद, कई क्षेत्रों में कोलोस्ट्रम को अशुद्ध या हानिकारक मानकर फेंक देने की प्रथा आज भी विद्यमान है। कुछ समुदायों में यह विश्वास है कि पहला दूध भारी होता है या शिशु के लिए पचाना कठिन है। इसके स्थान पर शहद, शक्कर का पानी या पशु-दूध जैसे प्री-लैक्टियल आहार दिए जाते हैं। ये प्रथाएँ न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से गलत हैं, बल्कि शिशु को संक्रमण के गंभीर जोखिम में भी डालती हैं।
कोलोस्ट्रम से वंचित रखने के दुष्परिणाम तत्काल और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर दिखाई देते हैं। शुरुआती घंटों में कोलोस्ट्रम न मिलने से शिशु में रक्त शर्करा की कमी, संक्रमण और पाचन संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। यह पहला दूध शिशु के पेट में मौजूद अपशिष्ट पदार्थ को बाहर निकालने में भी सहायक होता है, जिससे पीलिया का खतरा कम होता है। लंबे समय में, देर से स्तनपान शुरू होने के कारण अनन्य स्तनपान की अवधि भी प्रभावित होती है, जिसका असर शिशु के समग्र पोषण पर पड़ता है।
नीतिगत स्तर पर भारत ने प्रारम्भिक स्तनपान के महत्त्व को स्वीकार किया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य दिशानिर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू किया जाना चाहिए और कोलोस्ट्रम को किसी भी स्थिति में नहीं फेंकना चाहिए। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने वाली योजनाओं ने इस दिशा में अवसर तो बढ़ाया है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन दिशानिर्देशों का पालन समान रूप से नहीं हो पा रहा है।
इस अंतर का एक बड़ा कारण स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका और क्षमता से जुड़ा है। प्रसव के बाद डॉक्टर, नर्स और दाई माँ और परिवार के लिए सबसे विश्वसनीय मार्गदर्शक होते हैं। जब वे सक्रिय रूप से कोलोस्ट्रम पिलाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और परिवार की आशंकाओं का समाधान करते हैं, तो सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। लेकिन जहाँ प्रशिक्षण की कमी, काम का दबाव या उदासीनता होती है, वहाँ गलत प्रथाएँ बिना चुनौती के जारी रहती हैं।
कोलोस्ट्रम का प्रश्न केवल चिकित्सा का नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और महिला की निर्णय क्षमता से भी जुड़ा है। अनेक परिवारों में शिशु आहार से जुड़े निर्णय माँ स्वयं नहीं ले पाती। बुज़ुर्गों या पारम्परिक मान्यताओं का प्रभाव चिकित्सकीय सलाह पर भारी पड़ जाता है। ऐसे में केवल माताओं को शिक्षित करना पर्याप्त नहीं है; परिवार और समुदाय को साथ लेकर चलना अनिवार्य है।
जनसंचार अभियानों में टीकाकरण और पोषण पर पर्याप्त बल दिया गया है, लेकिन कोलोस्ट्रम पर अपेक्षित निरंतर और स्पष्ट संवाद का अभाव रहा है। इसे अक्सर स्तनपान का एक छोटा सा हिस्सा मान लिया जाता है, जबकि वास्तव में यह नवजात स्वास्थ्य की नींव है। स्थानीय भाषा में, सांस्कृतिक संदर्भों के साथ, कोलोस्ट्रम के लाभों को समझाने की आवश्यकता है ताकि भ्रान्तियों को जड़ से समाप्त किया जा सके।
आर्थिक दृष्टि से भी कोलोस्ट्रम एक अत्यंत प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय है। यह निःशुल्क, सर्वसुलभ और तत्काल उपलब्ध है। यदि इसके माध्यम से नवजात संक्रमण और जटिलताओं को कम किया जाए, तो स्वास्थ्य व्यवस्था पर बोझ घटेगा और परिवारों के चिकित्सा खर्च में भी कमी आएगी। सीमित संसाधनों के दौर में ऐसे उपायों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
बढ़ते सिज़ेरियन प्रसव भी एक नई चुनौती प्रस्तुत करते हैं। ऑपरेशन के बाद माँ और शिशु के बीच संपर्क में देरी के कारण स्तनपान शुरू होने में विलम्ब होता है। अस्पतालों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सर्जिकल प्रसव की स्थिति में भी त्वचा से त्वचा संपर्क और कोलोस्ट्रम पिलाने की प्रक्रिया बाधित न हो।
निजी स्वास्थ्य संस्थानों की भूमिका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र में जहाँ सरकारी कार्यक्रमों का पालन अपेक्षाकृत अधिक होता है, वहीं निजी संस्थानों में व्यवहार में विविधता दिखाई देती है। गुणवत्ता मानकों और पेशेवर जिम्मेदारी के माध्यम से प्रारम्भिक स्तनपान को हर जगह अनिवार्य व्यवहार के रूप में स्थापित करना आवश्यक है।
कोलोस्ट्रम केवल पोषण का स्रोत नहीं, बल्कि उस दृष्टिकोण का प्रतीक है जिसमें प्राकृतिक प्रक्रियाओं और वैज्ञानिक समझ का संतुलन दिखाई देता है। यह याद दिलाता है कि बेहतर स्वास्थ्य केवल तकनीक से नहीं, बल्कि सही समय पर सही ज्ञान के उपयोग से भी प्राप्त होता है।
अंततः, कोलोस्ट्रम को बढ़ावा देना एक प्रशासनिक और सामाजिक संकल्प का विषय है। नीति, स्वास्थ्य व्यवस्था और समुदाय के बीच समन्वय के बिना यह लक्ष्य अधूरा रहेगा। यदि प्रत्येक नवजात को जीवन के पहले घंटे में यह पहला प्राकृतिक टीका मिल सके, तो यह न केवल शिशु स्वास्थ्य में सुधार का संकेत होगा, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति हमारी सामूहिक परिपक्वता का भी प्रमाण होगा।
कोलोस्ट्रम: पहला प्राकृतिक टीका
