चीन में सत्ता का शुद्धिकरण

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चीन में सत्ता का शुद्धिकरण और वैश्विक लोकतंत्र का संकट

चीन के सत्ता गलियारों में छाया गहरा सन्नाटा अक्सर किसी बड़े भू-राजनीतिक विस्फोट की पूर्वपीठिका होता है। हाल ही में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के शीर्ष कमांडर जनरल झांग यूसिया की अचानक बर्खास्तगी ने बीजिंग के उस ‘सूचनाओं के सामरिक कोहरे’ को और अधिक सघन कर दिया है, जिसे भेद पाना वैश्विक विश्लेषकों के लिए एक चुनौती बना हुआ है। सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) के उपाध्यक्ष और पोलित ब्यूरो के सदस्य के रूप में झांग केवल एक सैन्य अधिकारी नहीं, बल्कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सबसे विश्वस्त ‘प्रिंसलिंग’ सहयोगियों में से एक थे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस निष्कासन को लेकर विरोधाभासी सूचनाओं का एक ऐसा अंबार लगा है जो चीनी राज्य की अपारदर्शिता को उजागर करता है। जहाँ ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने सूत्रों के हवाले से परमाणु रहस्यों को अमेरिका को लीक करने और रक्षा सौदों में घूसखोरी जैसे सनसनीखेज आरोप लगाए हैं, वहीं ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘वाशिंगटन पोस्ट’ जैसे संस्थान इन विशिष्ट आरोपों पर मौन साधते हुए इसे शी जिनपिंग की बढ़ती ‘असुरक्षा’ और सत्ता पर पकड़ मजबूत करने की कवायद के रूप में देख रहे हैं। सूचना का यह शून्य सिद्ध करता है कि अधिनायकवादी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता का अभाव केवल एक प्रशासनिक विवशता नहीं, बल्कि विरोधियों को कुचलने का एक सुव्यवस्थित हथियार है।

सत्ता के इस क्रूर बदलाव को राजनीतिक शब्दावली में ‘पर्ज’ (Purge) कहा जाता है, जो किसी भी तानाशाही शासन में शक्ति के संकेंद्रण की एक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह महज एक अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक प्रदर्शन है, जिसका उद्देश्य जनता के मानस में यह भ्रम पैदा करना है कि पार्टी निरंतर अपना ‘शुद्धिकरण’ कर रही है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे वफादारों को अचानक ‘विदेशी एजेंट’ या ‘भ्रष्ट’ घोषित कर दिया जाता है, तो यह पार्टी के भीतर ही एक कृत्रिम ‘आंतरिक शत्रु’ पैदा करने का खेल होता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से नागरिकों को स्वतंत्र विचार रखने वाले व्यक्तियों से बदलकर ‘पार्टी लाइन’ के ऐसे गुलामों में तब्दील कर दिया जाता है, जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं होती। यह शुद्धिकरण का भ्रम जनता को इस विश्वास में बांधे रखता है कि व्यवस्था अपनी बुराइयों से लड़ रही है, जबकि वास्तव में सत्ता का दमनकारी ढांचा और भी अधिक अभेद्य होता जाता है।

इतिहास का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो स्पष्ट होता है कि निरंकुशता का यह चक्र माओ से लेकर स्टालिन और सद्दाम हुसैन तक एक ही डरावने प्रतिमान पर आधारित रहा है। माओत्से तुंग ने ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के दौरान अपने ही उत्तराधिकारी लियू शाओकी को जिस तरह अपमानित कर निकाला, उसकी परिणति इतनी भयावह थी कि 1969 में उनकी मृत्यु के पांच साल बाद 1974 तक देश को इसकी भनक तक नहीं लगने दी गई। जनरल पेंग देहुई जैसे युद्ध नायकों को जेल में तिल-तिल कर मरने के लिए छोड़ दिया गया, जबकि डेंग शाओपिंग को दो बार सत्ता से बेदखल कर ट्रैक्टर फैक्ट्री में काम करने के लिए मजबूर किया गया। यही प्रवृत्ति वैश्विक स्तर पर हिटलर की ‘नाइट ऑफ द लॉन्ग नाइफ्स’ में अर्नेस्ट रोम की हत्या और सद्दाम हुसैन द्वारा 1979 में बाथ पार्टी के अधिकारियों के सरेआम कत्लेआम में दिखाई देती है। इन सभी उदाहरणों में एक साझा सूत्र ‘असुरक्षा’ का है—जहाँ तथाकथित शक्तिशाली नेता अपनी कुर्सी को सुरक्षित रखने के लिए योग्यता और दीर्घकालिक वफादारी की बलि चढ़ाने में संकोच नहीं करते।

निरंकुशता का यह ऐतिहासिक साया केवल सीमाओं के भीतर सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थिरता को अपनी चपेट में ले लेता है। भारत के पड़ोस में पारदर्शिता और जवाबदेही वाले लोकतंत्र का दायरा जिस तरह सिमट रहा है, वह वैश्विक स्तर पर एक बड़े संकट का संकेत है। पाकिस्तान में लोकतंत्र सेना की बिछाई बिसात पर एक प्यादे जैसा है, जहाँ जनरल मुनीर के सामने प्रधानमंत्री की हैसियत गौण हो चुकी है। म्यांमार में सैन्य जुंटा का दमनकारी शासन है, तो बांग्लादेश में विशेषज्ञ-नीत अंतरिम सरकार व्यवस्था को संभालने का प्रयास कर रही है। चीन का यह मॉडल, जहाँ एक जनरल बिना किसी स्पष्टीकरण के अचानक गायब हो जाता है, हमारे पड़ोस में लोकतांत्रिक मूल्यों के संस्थागत क्षरण की एक गंभीर चेतावनी है। जवाबदेही का यह अभाव केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि उस वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है जहाँ सत्ता का एकमात्र उद्देश्य नागरिक अधिकारों को कुचलकर अपना अस्तित्व बचाए रखना है।

इसी संदर्भ में आधुनिक शासन प्रणालियों में लोकतंत्र का रूपांतरण अब एक ‘असेंबली लाइन प्रोडक्शन’ के रूप में होने लगा है, जहाँ नागरिकों को एक सांचे में ढली हुई प्रतिस्थापन योग्य वस्तु की तरह तैयार किया जा रहा है। जिस तरह फैक्ट्रियों में लागत कम करने के लिए मजदूरों को आसानी से बदला जा सकता है, ठीक उसी तरह आज की प्रणालियों में नागरिकों और उच्च अधिकारियों की विशिष्टता को समाप्त कर उन्हें केवल ‘पार्टी लाइन’ का पुर्जा बनाया जा रहा है। भारत के भीतर भी इस संस्थागत क्षरण के लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं। ओडिशा के 2024 के चुनाव में 147 विधानसभा क्षेत्रों के 58 बूथों पर विसंगतियों के जो आंकड़े सामने आए हैं—जहाँ तलसरा जैसे क्षेत्रों में फॉर्म 17 के अनुसार 682 वोट पड़े लेकिन फॉर्म 20 में शून्य दर्ज हुआ, या जहाँ 1400 से अधिक वोट डाले जाने के बावजूद एक भी वोट नहीं गिना गया—वे पारदर्शिता की समाप्ति का जीवंत प्रमाण हैं। विडंबना यह है कि एक तरफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी रणनीतियों की बात होती है, तो दूसरी तरफ भाजपा और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच होने वाली उच्च स्तरीय बैठकों का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया जाता। किरेन रिजिजू जैसे कद्दावर मंत्रियों का बिना किसी तार्किक कारण के अचानक स्थानांतरण और न्यायिक नियुक्तियों में बढ़ता हस्तक्षेप उसी ‘पर्ज’ संस्कृति की आहट है जहाँ व्यक्तिगत निष्ठा ही एकमात्र पैमाना रह जाती है।

यह वास्तव में ‘नागरिक की मृत्यु’ का वह दौर है जहाँ समाज को ‘पार्टी’ में तब्दील कर दिया गया है। जब व्यक्तिगत आवाज का मोल समाप्त हो जाता है और जांच एजेंसियां केवल राजनीतिक प्रतिशोध का माध्यम बन जाती हैं, तो लोकतंत्र के दरवाजे अब लकड़ी के नहीं, बल्कि लोहे की सलाखों में बदलने लगते हैं। वैश्विक स्तर पर ‘मजबूत नेताओं’ द्वारा बुना गया यह जाल इतना सूक्ष्म और व्यापक है कि नागरिकता के अंतिम अवशेषों को बचाने के लिए इतिहास और वर्तमान के इन डरावने प्रतिमानों को समय रहते पहचानना अनिवार्य हो गया है, अन्यथा लोकतंत्र केवल एक स्मरणीय अतीत बनकर रह जाएगा।

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