यूजीसी’ के नए नियम 2026

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यूजीसी के नए नियम — सामाजिक न्याय या विभाजन की शुरुआत?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने के उद्देश्य से लागू किए गए नए नियम (एंटी-डिस्क्रिमिनेशन रूल्स 2026) को लेकर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। सोशल मीडिया पर ‘UGC Rollback’ और ‘Shame on UGC’ जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सवर्ण समाज सड़कों पर उतरकर अपना विरोध दर्ज करा रहा है। शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में सामाजिक न्याय स्थापित करने के नाम पर लाए गए ये नियम क्या वास्तव में समाज को जाति के आधार पर और अधिक बाँटने वाले साबित हो रहे हैं—यह प्रश्न अब गंभीर रूप से उठ खड़ा हुआ है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसी दुखद आत्महत्या की घटनाओं की पृष्ठभूमि में विश्वविद्यालय परिसरों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए कठोर कदम उठाना आवश्यक था, इसमें कोई विवाद नहीं है। किंतु यूजीसी द्वारा तैयार किए गए मसौदे की प्रकृति और उसकी एकतरफा प्रवृत्ति को देखते हुए यह आशंका गहराती है कि ये नियम ‘अन्याय के निवारण’ की बजाय ‘दंडात्मक हथियार’ बन सकते हैं।

नए नियमों के तहत यदि किसी छात्र या कर्मचारी पर भेदभाव का आरोप सिद्ध होता है, तो उसकी डिग्री रोकी जा सकती है और उसे भविष्य में किसी भी सरकारी नौकरी या यूजीसी की परीक्षाओं के लिए अयोग्य ठहराया जा सकता है। यह दंड किसी व्यक्ति के पूरे जीवन को प्रभावित करने वाला है। चिंता की बात यह है कि इन नियमों की संरचना ‘जनरल बनाम एससी/एसटी/ओबीसी’ की मानसिकता पर आधारित प्रतीत होती है, मानो भेदभाव केवल सवर्ण वर्ग की ओर से ही होता हो।

यहीं मूल प्रश्न सामने आता है—क्या भेदभाव की कोई जाति होती है? महाविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव, छात्रावासों के विवाद या व्यक्तिगत रंजिश के चलते यदि किसी सवर्ण छात्र के विरुद्ध झूठी शिकायत दर्ज कर दी जाए, तो उसके बचाव के लिए इन नियमों में क्या प्रावधान है? जेएनयू और बीएचयू जैसे परिसरों की दीवारों पर जब किसी विशेष जाति के विरुद्ध विषाक्त नारे लिखे जाते हैं, तो क्या वे भेदभाव की श्रेणी में नहीं आते? कश्मीरी पंडितों के साथ हुआ अन्याय क्या भेदभाव नहीं था? नियम सभी के लिए समान होने चाहिए, न कि जाति के चश्मे से किसी एक वर्ग को पहले से ही आरोपी मान लेने वाले।

इन नियमों के तहत कॉलेजों में ‘इक्विटी कमेटी’ और ‘इक्विटी स्क्वाड’ जैसी व्यवस्थाएँ खड़ी की जा रही हैं। आशंका है कि इनका उपयोग शैक्षणिक वातावरण सुधारने से अधिक राजनीतिक उद्देश्य साधने के लिए किया जा सकता है। 24 घंटे में बैठक और 15 दिनों में रिपोर्ट देने की जल्दबाजी तथा उसके आधार पर की जाने वाली कठोर कार्रवाई से परिसर में भय का वातावरण बन सकता है। किसी झूठी शिकायत की तलवार के नीचे मेधावी और मेहनती छात्रों का भविष्य लटकना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक है।

इस पूरे मुद्दे का एक राजनीतिक पक्ष भी है। आगामी चुनावों के संदर्भ में यह सवाल उठ रहा है कि क्या किसी विशेष वोट बैंक को खुश करने के लिए सवर्ण समाज को निशाना बनाया जा रहा है। जिस समाज ने लंबे समय तक सत्ता प्रतिष्ठान का समर्थन किया, वही समाज अब खुद को ‘स्वतःसिद्ध’ मान लिए जाने की भावना से आक्रोशित महसूस कर रहा है। यही कारण है कि राजस्थान से लेकर दिल्ली तक विभिन्न संगठन और छात्र समूह इन नियमों के विरोध में एकजुट हो रहे हैं।

सामाजिक न्याय एक अत्यंत संवेदनशील विषय है। इसे केवल कानून का डंडा दिखाकर हासिल नहीं किया जा सकता; इसके लिए विश्वास और संवाद का वातावरण आवश्यक होता है। यूजीसी के ये नियम दोधारी तलवार की तरह हैं। एक अन्याय को सुधारने के नाम पर दूसरे वर्ग के साथ अन्याय करना या भय का माहौल बनाकर सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाना किसी भी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती।

सरकार और यूजीसी को इन नियमों पर तत्काल पुनर्विचार करना चाहिए। भेदभाव का अंत होना ही चाहिए, लेकिन इसके लिए बनाए गए कानून ‘संरक्षक’ हों, ‘भक्षक’ नहीं। शिकायतों की निष्पक्ष जाँच की व्यवस्था, झूठी शिकायत करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई और सबसे महत्वपूर्ण—जाति से ऊपर उठकर ‘छात्र’ के रूप में सभी को समान सुरक्षा देने वाले नियम—आज देश की शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक आवश्यकता हैं। अन्यथा, विश्वविद्यालय परिसर ज्ञान के केंद्र न रहकर जातिगत संघर्ष के अखाड़े बनते चले जाएँगे।

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