महोबा ज़िले में जल जीवन मिशन के अंतर्गत लगभग पैंसठ लाख रुपये की लागत से निर्मित पानी की टंकी उद्घाटन के चौबीस घंटे के भीतर ही रिसाव करने लगी । यह घटना केवल निर्माण संबंधी त्रुटि नहीं है; यह सार्वजनिक व्यय, ठेका प्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही के ढाँचे में निहित गहरी समस्या का संकेत है। स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना किसी भी कल्याणकारी राज्य की मूल जिम्मेदारी है। यदि इसी उद्देश्य से बनाई गई संरचना परीक्षण चरण में ही विफल हो जाए, तो विकास के दावे औपचारिकता तक सीमित प्रतीत होते हैं। जल जीवन मिशन जैसी व्यापक योजना का प्रभाव उसके घोषणापत्र से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की गुणवत्ता से आँका जाना चाहिए।
इस परिघटना की जड़ में निविदा प्रणाली की वह प्रवृत्ति दिखाई देती है जिसमें सबसे कम बोली लगाने वाले को प्राथमिकता दी जाती है। व्यय नियंत्रण के नाम पर अपनाई गई यह व्यवस्था व्यवहार में गुणवत्ता से समझौता करा सकती है। न्यूनतम दर हमेशा सर्वोत्तम कार्य का पर्याय नहीं होती। सार्वजनिक निर्माण कार्यों में सामग्री की गुणवत्ता, तकनीकी मानक, दीर्घकालिक टिकाऊपन और सुरक्षा की स्पष्ट लागत होती है। यदि अनुमानित लागत से अत्यधिक कम दर पर कार्य आवंटित किया जाता है, तो उसकी पूर्ति प्रायः निम्न स्तर की सामग्री या अपर्याप्त निगरानी से की जाती है। परिणामस्वरूप संरचना तो खड़ी हो जाती है, परंतु उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध रहती है।
एक अन्य गंभीर पक्ष बहुस्तरीय उप-ठेका व्यवस्था है। कागज़ पर कार्य लेने वाला मुख्य ठेकेदार अक्सर इसे आगे उप-ठेकेदारों को सौंप देता है। प्रत्येक स्तर पर लाभांश निकालने की प्रवृत्ति अंततः उस छोटे ठेकेदार पर दबाव बनाती है जो वास्तविक निर्माण कर रहा होता है। यदि मूल स्वीकृत राशि का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न स्तरों पर कट जाता है, तो अंतिम क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त संसाधन शेष नहीं रहते। ऐसी स्थिति में लागत घटाने के लिए सामग्री या प्रक्रिया में समझौता लगभग अपरिहार्य हो जाता है। यह केवल आर्थिक विकृति नहीं, बल्कि जवाबदेही के क्षरण की प्रक्रिया है, जिसमें जिम्मेदारी की रेखाएँ धुंधली हो जाती हैं।
सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता और स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण की अनुपस्थिति भी समस्या को गहरा करती है। प्रशासनिक स्वीकृतियों और फाइलों की औपचारिक गति यदि संस्थागत अनुशासन के बजाय अनौपचारिक व्यवस्थाओं से प्रभावित हो, तो परियोजना की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच समन्वय आवश्यक है, परंतु यह समन्वय नियमबद्ध और निगरानीयुक्त होना चाहिए। पेयजल जैसी आधारभूत सेवा में लापरवाही का सीधा प्रभाव नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवनस्तर पर पड़ता है।
यह घटना किसी एक ज़िले तक सीमित नहीं मानी जानी चाहिए। सार्वजनिक ठेका प्रणाली में गुणवत्ता आधारित चयन, पूर्व अनुभव का मूल्यांकन, कार्य निष्पादन की चरणबद्ध जाँच और तृतीय पक्षीय लेखा परीक्षण को अनिवार्य बनाना आवश्यक है। उप-ठेका व्यवस्था पर स्पष्ट सीमाएँ और उत्तरदायित्व निर्धारण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डिजिटल निगरानी, पारदर्शी निविदा प्रक्रियाएँ और स्थानीय समुदाय की सहभागिता के माध्यम से सार्वजनिक व्यय की विश्वसनीयता बढ़ाई जा सकती है।
विकास का वास्तविक अर्थ उद्घाटन समारोह नहीं, बल्कि टिकाऊ और सुरक्षित सार्वजनिक संरचना है। यदि नई बनी पानी की टंकी कुछ ही घंटों में रिसने लगे, तो यह केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास के क्षरण का प्रतीक है। प्रशासनिक सुधार और प्रणालीगत उत्तरदायित्व के बिना ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं रहेंगी। सार्वजनिक धन नागरिकों के अधिकार से जुड़ा है, और उस अधिकार की रक्षा संस्थागत ईमानदारी और कठोर निगरानी से ही संभव है।
टेंडर प्रणाली और जवाबदेही संकट
